Wednesday, 10 September 2014
Monday, 8 September 2014
पीठ पर बोझ
पीठ पर बोझ

सुबह सुबह
पीठ पर लादे बस्ता
वो लड़की
चली जा रही थी
स्कूल बस की ओर
सुनहरे भविष्य की
खोज में ।
ठीक उसी समय
चली जा रही थी
अपनी पीठ पर डाले
एक बड़ा सा खाली बोरा
कचरे के ढेर से
चमकीली पन्नियों
में
खोजते हुए
सुनहरा वर्तमान ।
शाम को
दोनों लौटती
अपने अपने घर
लिये
होम वर्क का बोझ
एक को करना था पूरा
माँ के साथ बैठ कर
तो दूजी को
पूरे घर के काम
माँ के घर आने से
पहले ।
दिन भर की थकावट
के बाद दोनों
सो जाती निदिंयाँ
रानी की
गोद में
एक सुनहरी सुबह
की आश में ।
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देवेन्द्रसिंह सिसौदिया
Saturday, 6 September 2014
Sunday, 31 August 2014
क्या पाकिस्तान में तख्ता पलट के आसार ?
क्या पाकिस्तान में तख्ता
पलट के आसार ?
देवेन्द्रसिंह
सिसौदिया
इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान
तहरीक ए इंसाफ और मौलवी ताहिर उल-कादरी के समर्थक 17 दिन से नेशनल असेंबली के सामने डेरा डाले हुए
हैं। वे प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। सेना प्रदर्शनकारी
और सरकार के बीच मध्यस्थता कर रही है।. पाकिस्तान में
शनिवार रात हालात बेकाबू हो गए। प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के इस्तीफे पर अड़े हजारों
प्रदर्शनकारियों ने रात 11 बजे उनके आवास और संसद भवन पर
धावा बोल दिया। इस्लामाबाद में हुए लाठीचार्ज के बाद पाकिस्तान के अन्य शहरों में
विरोध प्रदर्शन की खबर है। पाकिस्तान की व्यापारिक राजधानी कराची में भी देर रात
लोग सड़कों पर आ गए। लाहौर, मुल्तान जैसे पाकिस्तान के
महत्वपूर्ण शहरों में भी देर रात विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। यह राजनीतिक अस्थिरता ऐसे वक्त आई है जब पाकिस्तान
आतंकवादियों और खासतौर पर अफगान सीमा से लगे कबायली इलाके में आतंकवाद के खिलाफ तथा
कथित अभियान चला रहा है |
पाकिस्तान
एक मुस्लीम देश है जहाँ लोकतांत्रिक व्यवस्था मौजूद है । कहने को लोकतांत्रिक व्यवस्था
है किंतु इतिहास गवाह है कि यहाँ की सरकार पर हमेशा सेना हावी रहती है । दूसरी ओर
एक शेडो सरकार आतंकवादी संगठनों और आइ एस एस आई की काम करती है । देश की आंतरिक
व्यव्स्था एक दम चरमरा गई है । आर्थिक रुप से बहुत ही कमज़ोर स्थिति से गुजर रहा है
। देश का अधिकांश राजस्व सुरक्षा की नाम पर लगा दिया जाता है । छोटे छोटे राजनैतिक
दलों को कुचल दिया जाता है । देश में
भ्रष्टाचार चरम सीमा पर है । प्रधान मंत्री नवाज़ शरीफ पर जो आरोप लगाए है उनमें से
एक भ्र्ष्टाचार भी है ।
पाकिस्तान में सेना प्रमुख जनरल राहिल शरीफ द्वारा
संकट से घिरी सरकार और प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के इस्तीफे की मांग कर रहे
प्रदर्शनकारियों के बीच मध्यस्थता को लेकर दोनों पक्ष एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे
हैं। सत्ताधारी दल के कुछ लोगों का कहना
है कि विरोध प्रदर्शन को सेना के कुछ महत्वपूर्ण लोगों का भी साथ मिल सकता है।
सेना और वर्तमान सरकार में कई मतभेद बताए जाते हैं।
देश
में 67 वर्षो के दौरान अभी तक तीन बार तख्ता पळट हुआ है । सन 1958, 1977 व 1999
में लगभग ऐसी ही स्थिति पैदा हुई थी और सेना के सहारे यहाँ तख्ता पलट दिया गया था
। वर्ष 1999 में एक बार नवाज़ शरीफ तत्कालीन
सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ के द्वारा किये तख्ता पलट का सामना कर चुके है । सेना का प्रदर्शनकारियों के प्रति नरम रवैया इस शंका को जन्म देता है कि
क्या पाकिस्तान में तख्ता पलट के आसार है ?
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Friday, 29 August 2014
Thursday, 28 August 2014
Tuesday, 26 August 2014
जिसका काम उसी को साजे और करे तो जूता बाजे
जिसका काम उसी को साजे और करे तो जूता बाजे
(अतिथि व्यंग्यकार) देवेन्द्रसिंह सिसौदिया
हमारे देश में ये बड़ी समस्या है। जिसको जो काम दिया वो नहीं करता और दूसरों के काम में जरुर टांग अड़ाते हैं । लेखकों का काम है लिखने का, डॉक्टर का चिकित्सा का, लोकसेवकों का बाबूगिरी का और नेता का नेतागिरी का। आज कल एक दूसरे के कार्यक्षेत्र में अतिक्रमण करने की फैशन सी चल पड़ी है । लेखक के पेशे को भी लोगों ने छोड़ा नहीं है । देश के नेता और लोक सेवक बदस्तूर किताब लिखने में व्यस्त हैं । चाहे जिन्दगी भर खुद के भाषण दूसरों से लिखवाए होंगे किंतु जिन्दगी की संध्या में सब को लेखन का शौक परवान चढ़ जाता है । कहते है फिल्मों की सफलता हेतु जिस प्रकार आईटम सांग का सहारा लिया जाता है ठीक वैसे ही पुस्तकों की बिक्री बढ़ाने के लिए बड़े नेताओं के चरित्र और काम काज़ के तोर तरीकों का ज़िक्र किया जा रहा है ।
हारे हुए नेताओं, सेवानिवृत्त हुए सचिवालय के सलाहकर एवं सचिवों ने किताब क्या लिख दी, पूरे देश में तहलका मच गया । हर समाचार चैनल और समाचार पत्रों में किताब की समीक्षा प्रारम्भ हो गई । तहलका तो मचना ही था। हकीकत भी बयाँ की तो किसकी और किस समय । इनको किताब लिखना ही था तो कोई और विषय नहीं मिला। पहले ही समस्या कम थी जो एक नई समस्या खड़ी कर दी । इनको शेर और बिल्ली में भेद पता नहीं जो ऐसी ना समझी वाली बात कर दी । इतने बड़े आदमी थे। थोड़ा सोचते-विचारते । क्या इसके नतीजों से ये वाकिब नहीं थे? आपकी चन्द लाइनों ने हमारी लाइन को कितना छोटा कर दिया, पता है आपको ? हार चुके थे, आराम का जीवन व्यतीत करते, ऐशो आराम से रहते किंतु इन्होंने तो हाईकमान का भी सेवानिवृत्त होने का इंतजाम कर दिया ।
जीवन भर जिन्होंने नमक खाया वो कैसे नमक हराम हो गए । पूरा जीवन हमारे खेमे में रह कर ऐशो- आराम किया, विदेश यात्राएं की, करोड़ों की सम्पति बनाई वो अचानक विपक्षियों की भाषा बोलने लगे हैं । कहते है हमारी बिरयानी का स्वाद बदल गया है ।
ऐसे ही हमारे पूर्व नेताओं ने भी अपने कार्यकाल के बारे में, अपने तत्कालीन बॉस के बारे में, अपने पड़ोसी देश के नेताओं के बारे में किताबें लिखकर कई बवण्डर खड़े किये । इन बवण्डर में कईं पेड़ जड़ से उखड़ गए। इतना ही नहीं, कईं आत्मकथाओं ने तो जो स्वर्गवासी हो चुके थे, उनकी आत्मा को भी झकझोर दिया और जो जीवित है उनका जीवन दूभर कर दिया ।
मेरा निवेदन है ईश्वर ने सारी सुख सुविधाए दी है, उनका लुत्फ उठाए । जहाँ तक लेखन का काम है वो लिखने वाले बहुत हैं । आप तो उनकी लिखी किताबों का विमोचन करें, उन्हें प्रोत्साहित करें और शुभकामनाएं सन्देश भेजते रहें । अंत में कहूंगा, “ जिसका काम उसी को साजे और करे तो जूते बाजे”।
जिसका काम उसी को साजे और करे तो जूता बाजे
— 26/08/2014 0 21हमारे देश में ये बड़ी समस्या है। जिसको जो काम दिया वो नहीं करता और दूसरों के काम में जरुर टांग अड़ाते हैं । लेखकों का काम है लिखने का, डॉक्टर का चिकित्सा का, लोकसेवकों का बाबूगिरी का और नेता का नेतागिरी का। आज कल एक दूसरे के कार्यक्षेत्र में अतिक्रमण करने की फैशन सी चल पड़ी है । लेखक के पेशे को भी लोगों ने छोड़ा नहीं है । देश के नेता और लोक सेवक बदस्तूर किताब लिखने में व्यस्त हैं । चाहे जिन्दगी भर खुद के भाषण दूसरों से लिखवाए होंगे किंतु जिन्दगी की संध्या में सब को लेखन का शौक परवान चढ़ जाता है । कहते है फिल्मों की सफलता हेतु जिस प्रकार आईटम सांग का सहारा लिया जाता है ठीक वैसे ही पुस्तकों की बिक्री बढ़ाने के लिए बड़े नेताओं के चरित्र और काम काज़ के तोर तरीकों का ज़िक्र किया जा रहा है ।
हारे हुए नेताओं, सेवानिवृत्त हुए सचिवालय के सलाहकर एवं सचिवों ने किताब क्या लिख दी, पूरे देश में तहलका मच गया । हर समाचार चैनल और समाचार पत्रों में किताब की समीक्षा प्रारम्भ हो गई । तहलका तो मचना ही था। हकीकत भी बयाँ की तो किसकी और किस समय । इनको किताब लिखना ही था तो कोई और विषय नहीं मिला। पहले ही समस्या कम थी जो एक नई समस्या खड़ी कर दी । इनको शेर और बिल्ली में भेद पता नहीं जो ऐसी ना समझी वाली बात कर दी । इतने बड़े आदमी थे। थोड़ा सोचते-विचारते । क्या इसके नतीजों से ये वाकिब नहीं थे? आपकी चन्द लाइनों ने हमारी लाइन को कितना छोटा कर दिया, पता है आपको ? हार चुके थे, आराम का जीवन व्यतीत करते, ऐशो आराम से रहते किंतु इन्होंने तो हाईकमान का भी सेवानिवृत्त होने का इंतजाम कर दिया ।
जीवन भर जिन्होंने नमक खाया वो कैसे नमक हराम हो गए । पूरा जीवन हमारे खेमे में रह कर ऐशो- आराम किया, विदेश यात्राएं की, करोड़ों की सम्पति बनाई वो अचानक विपक्षियों की भाषा बोलने लगे हैं । कहते है हमारी बिरयानी का स्वाद बदल गया है ।
ऐसे ही हमारे पूर्व नेताओं ने भी अपने कार्यकाल के बारे में, अपने तत्कालीन बॉस के बारे में, अपने पड़ोसी देश के नेताओं के बारे में किताबें लिखकर कई बवण्डर खड़े किये । इन बवण्डर में कईं पेड़ जड़ से उखड़ गए। इतना ही नहीं, कईं आत्मकथाओं ने तो जो स्वर्गवासी हो चुके थे, उनकी आत्मा को भी झकझोर दिया और जो जीवित है उनका जीवन दूभर कर दिया ।
मेरा निवेदन है ईश्वर ने सारी सुख सुविधाए दी है, उनका लुत्फ उठाए । जहाँ तक लेखन का काम है वो लिखने वाले बहुत हैं । आप तो उनकी लिखी किताबों का विमोचन करें, उन्हें प्रोत्साहित करें और शुभकामनाएं सन्देश भेजते रहें । अंत में कहूंगा, “ जिसका काम उसी को साजे और करे तो जूते बाजे”।
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