Sunday, 31 August 2014

क्या पाकिस्तान में तख्ता पलट के आसार ?

क्या पाकिस्तान में तख्ता पलट के आसार ?
            देवेन्द्रसिंह सिसौदिया

            इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ और मौलवी ताहिर उल-कादरी के समर्थक 17 दिन से नेशनल असेंबली के सामने डेरा डाले हुए हैं। वे प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। सेना प्रदर्शनकारी और सरकार के बीच मध्यस्थता कर रही है।. पाकिस्तान में शनिवार रात हालात बेकाबू हो गए। प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के इस्तीफे पर अड़े हजारों प्रदर्शनकारियों ने रात 11 बजे उनके आवास और संसद भवन पर धावा बोल दिया। इस्लामाबाद में हुए लाठीचार्ज के बाद पाकिस्तान के अन्य शहरों में विरोध प्रदर्शन की खबर है। पाकिस्तान की व्यापारिक राजधानी कराची में भी देर रात लोग सड़कों पर आ गए। लाहौर, मुल्तान जैसे पाकिस्तान के महत्वपूर्ण शहरों में भी देर रात विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। यह राजनीतिक अस्थिरता ऐसे वक्त आई है जब पाकिस्तान आतंकवादियों और खासतौर पर अफगान सीमा से लगे कबायली इलाके में आतंकवाद के खिलाफ तथा कथित अभियान चला रहा है |
      पाकिस्तान एक मुस्लीम देश है जहाँ लोकतांत्रिक व्यवस्था मौजूद है । कहने को लोकतांत्रिक व्यवस्था है किंतु इतिहास गवाह है कि यहाँ की सरकार पर हमेशा सेना हावी रहती है । दूसरी ओर एक शेडो सरकार आतंकवादी संगठनों और आइ एस एस आई की काम करती है । देश की आंतरिक व्यव्स्था एक दम चरमरा गई है । आर्थिक रुप से बहुत ही कमज़ोर स्थिति से गुजर रहा है । देश का अधिकांश राजस्व सुरक्षा की नाम पर लगा दिया जाता है । छोटे छोटे राजनैतिक दलों को कुचल दिया जाता है । देश  में भ्रष्टाचार चरम सीमा पर है । प्रधान मंत्री नवाज़ शरीफ पर जो आरोप लगाए है उनमें से एक भ्र्ष्टाचार भी है ।
      पाकिस्तान में सेना प्रमुख जनरल राहिल शरीफ द्वारा संकट से घिरी सरकार और प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के इस्तीफे की मांग कर रहे प्रदर्शनकारियों के बीच मध्यस्थता को लेकर दोनों पक्ष एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं।  सत्ताधारी दल के कुछ लोगों का कहना है कि विरोध प्रदर्शन को सेना के कुछ महत्वपूर्ण लोगों का भी साथ मिल सकता है। सेना और वर्तमान सरकार में कई मतभेद बताए जाते हैं।
      देश में 67 वर्षो के दौरान अभी तक तीन बार तख्ता पळट हुआ है । सन 1958, 1977 व 1999 में लगभग ऐसी ही स्थिति पैदा हुई थी और सेना के सहारे यहाँ तख्ता पलट दिया गया था । वर्ष 1999 में एक बार नवाज़ शरीफ तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ के द्वारा किये तख्ता पलट  का सामना कर चुके है । सेना का प्रदर्शनकारियों के प्रति नरम रवैया इस शंका को जन्म देता है कि क्या पाकिस्तान में तख्ता पलट के आसार है ?    

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Tuesday, 26 August 2014

जिसका काम उसी को साजे और करे तो जूता बाजे

जिसका काम उसी को साजे और करे तो जूता बाजे

जिसका काम उसी को साजे और करे तो जूता बाजे

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writing the book(अतिथि व्यंग्यकार) देवेन्द्रसिंह सिसौदिया
हमारे देश में ये बड़ी समस्या है। जिसको जो काम दिया वो नहीं करता और दूसरों के काम में जरुर टांग अड़ाते हैं । लेखकों का काम है लिखने का, डॉक्टर का चिकित्सा का, लोकसेवकों का बाबूगिरी का और नेता का नेतागिरी का। आज कल एक दूसरे के कार्यक्षेत्र में अतिक्रमण करने की फैशन सी चल पड़ी है । लेखक के पेशे को भी लोगों ने छोड़ा नहीं है । देश के नेता और लोक सेवक बदस्तूर किताब लिखने में व्यस्त हैं । चाहे जिन्दगी भर खुद के भाषण दूसरों से लिखवाए होंगे किंतु जिन्दगी की संध्या में सब को लेखन का शौक परवान चढ़ जाता है । कहते है फिल्मों की सफलता हेतु जिस प्रकार आईटम सांग का सहारा लिया जाता है ठीक वैसे ही पुस्तकों की बिक्री बढ़ाने के लिए बड़े नेताओं के चरित्र और काम काज़ के तोर तरीकों का ज़िक्र किया जा रहा है ।
हारे हुए नेताओं, सेवानिवृत्त हुए सचिवालय के सलाहकर एवं सचिवों ने किताब क्या लिख दी, पूरे देश में तहलका मच गया । हर समाचार चैनल और समाचार पत्रों में किताब की समीक्षा प्रारम्भ हो गई । तहलका तो मचना ही था। हकीकत भी बयाँ की तो किसकी और किस समय । इनको किताब लिखना ही था तो कोई और विषय नहीं मिला। पहले ही समस्या कम थी जो एक नई समस्या खड़ी कर दी । इनको शेर और बिल्ली में भेद पता नहीं जो ऐसी ना समझी वाली बात कर दी । इतने बड़े आदमी थे। थोड़ा सोचते-विचारते । क्या इसके नतीजों से ये वाकिब नहीं थे? आपकी चन्द लाइनों ने हमारी लाइन को कितना छोटा कर दिया, पता है आपको ? हार चुके थे, आराम का जीवन व्यतीत करते, ऐशो आराम से रहते किंतु इन्होंने तो हाईकमान का भी सेवानिवृत्त होने का इंतजाम कर दिया ।
जीवन भर जिन्होंने नमक खाया वो कैसे नमक हराम हो गए । पूरा जीवन हमारे खेमे में रह कर ऐशो- आराम किया, विदेश यात्राएं की, करोड़ों की सम्पति बनाई वो अचानक विपक्षियों की भाषा बोलने लगे हैं । कहते है हमारी बिरयानी का स्वाद बदल गया है ।
ऐसे ही हमारे पूर्व नेताओं ने भी अपने कार्यकाल के बारे में, अपने तत्कालीन बॉस के बारे में, अपने पड़ोसी देश के नेताओं के बारे में किताबें लिखकर कई बवण्डर खड़े किये । इन बवण्डर में कईं पेड़ जड़ से उखड़ गए। इतना ही नहीं, कईं आत्मकथाओं ने तो जो स्वर्गवासी हो चुके थे, उनकी आत्मा को भी झकझोर दिया और जो जीवित है उनका जीवन दूभर कर दिया ।
मेरा निवेदन है ईश्वर ने सारी सुख सुविधाए दी है, उनका लुत्फ उठाए । जहाँ तक लेखन का काम है वो लिखने वाले बहुत हैं । आप तो उनकी लिखी किताबों का विमोचन करें, उन्हें प्रोत्साहित करें और शुभकामनाएं सन्देश भेजते रहें । अंत में कहूंगा, “ जिसका काम उसी को साजे और करे तो जूते बाजे”।

Monday, 25 August 2014

व्यंग्य रचना : पुलिस का हृदय परिवर्तन दिनांक 25 अगस्त 2014

व्यंग्य रचना : पुलिस का हृदय परिवर्तन





आपने पुलिस के एक अधिकारी को मुख्य आरोपी के माथे को चूमने पर निलम्बित होने की खबर पढ़ी होगी। किसी पुलिस वाले ने सम्भवतः पहली मर्तबा मित्र बनने की कोशिश की होगी। हो सकता है उन्होंने रात को अपनी ड्यूटी के दौरान महात्मा गांधी का ये कथन कि 'अपराध से नफरत करो अपराधी से नहीं', पढ़ डाला होगा और बस लग गए उसे आजमाने में। महाशय कोस रहे होंगे अपने आप को पुलिस वाले से एक मित्र बनने की नाकामयाब कोशिश पर। 

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आज तक पूरी दुनिया ने पुलिसिया क्रुर चेहरा देखा है अचानक उनका हृदय परिवर्तन होकर इंसान के रुप में अवतरित होना अचम्भे को तो जन्म देगा ही। पता नहीं कौन सी मजबूरी रही होगी जनाब की जो ऐसा कृत्य कर बैठे। भाई साहब को यदि कोई अच्छा काम करने की सूझी ही थी तो इसी अपराधी को क्यों चुना? या तो इस 'किस' के पीछे राजनैतिक पहलू होगा या भावनात्मक। हो सकता है अपराधी के करीबी जो अपनी भावना को उस तक पहुंचा नहीं पा रहे होंगे उन्होंने इन महाशय को माध्यम बनाया हो। ये भी हो सकता है कि इस काम के लिए उन्हें किसी तरह प्रलोभित किया हो। या एक अच्छा इंसान बनने की अंतरात्मा उन पर हावी हो गई और वो यह कर बैठे। 

क्या पुलिस वाले भाई साहब ने सच में कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया जिसकी सजा उन्हें निलम्बित होकर भोगना पड़ा ? क्या वो केवल डंडे की भाषा का ही उपयोग कर सकता है? क्या उसके अन्दर एक इंसान नहीं हो सकता? उसके मुंह से 'किस' नही 'गाली' ही निकलना चाहिए? अब कोई पुलिस वाला ऐसी हिम्मत कर पाएगा? कैसे हम उम्मीद रखें कि भविष्य में कोई पुलिस वाला मित्र के रुप नजर आएगा? क्या उन्हें प्रशिक्षण के दौरान ये नहीं सिखाया गया कि एक अच्छा इंसान बनने की नुमाईश कैमरे के समक्ष आने पर ही नहीं करे ? ऐसे अनेक प्रश्न इस घटना ने समाज और सरकार के समक्ष खड़े कर दिए हैं। 

मुझे भरोसा है दूसरे पुलिस वाले, इस कदम को एक अच्छा इंसान बनने की ओर अंतिम कदम न समझेंगे। वो इस दिशा में कोशिशें जारी रखेंगे। केवल 'किस' को ही इसका साधन न बनाऐंगे। कसम खाएंगे कि किसी भी अपराध होने से पहले ही वे एक्टिव हो जाएंगे, जब कोई थाने में एफआईआर लिखवाने आए तो उसे दरिदंगी से देखने की बजाय उसको भाई या बहन के रुप में सुनेगें। उसे टरकाने की बजाए तुरंत मामला दर्ज कर आगामी कार्यवाही पर जूट जाएंगे। किसी भी घटना की सूचना मिलने पर मीडिया के पहले स्थल पर पहुंच जाएंगे । यह कर के देखिए आप जरुर एक अच्छे इंसान बन जाएंगे। लोग आपका क्रुर रुप भूल कर एक मित्र की तरह व्यवहार करेंगे । फिर आप को किसी 'किस' विवाद में न पड़ना पड़ेगा बल्कि लोग आपको 'किस' देंगे !

Wednesday, 13 August 2014

हो रहा है पुलिस का हृदय परिवर्तन

                      पुलिस का हृदय परिवर्तन
देवेन्द्रसिंह सिसौदिया
      पिछले दिनों उत्तरप्रदेश में हत्या के मुख्य आरोपी के माथे को चूमने पर पुलिस के एक उच्च अधिकारी को  निलम्बित कर दिया । किसी पुलिस वाले का  सम्भवतः पहली मर्तबा ह्र्दय परिवर्तन हुआ और  अपनी छबी सुधारते हुए मित्र बनने की कोशिश की होगी । हो सकता है उन्होंने रात को अपनी ड्यूटी के दौरान महात्मा गांधी का ये कथन  “ अपराधी से नहीं, अपराध से घृना करो” पढ़ा होगा और बस लग गये  अजमाने में । महाशय अपने आप को  कोस रहे होंगे कहाँ इस चक्कर में पड़ गए ।
      आज तक पूरी दुनिया ने पुलिसिया क्रूर चेहरा ही देखा है अचानक उसका  इंसान के रुप में अवतरित होना,  अचम्भे को तो जन्म देगा ही । पता नहीं कौन सी मजबूरी रही जनाब की जो ऐसा कृत्य कर बैठे । भाई साहब  को  यदि कोई अच्छा काम करने की सूझी ही थी तो इसी अपराधी को क्यों चूना ? या तो इस “ किस”  के पिछे राजनैतिक पहलू होगा या भावनात्मक । हो सकता है अपराधी के करीबी जो अपनी भावना को उस तक पहुँचा नहीं पा रहे होंगे उन्होंने इन महाशय को माध्यम बनाया हो । ये भी हो सकता है कि इस काम के लिए उन्हें किसी तरह प्रलोभित किया हो । या एक अच्छा इंसान बनने की अंतरात्मा उन पर हावी हो गई  और वो ये कर बैठे ।
      क्या पुलिस वाले भाई साहब ने  सच में कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया जिसकी सजा उन्हें निलम्बित होकर भोगना पड़ा ?  क्या वो केवल ड्ण्डे की भाषा का ही उपयोग कर सकता है ? क्या उसके अन्दर एक इंसान नहीं हो सकता ? उसके मुँह से “ किस ”  नही “ गाली ”  ही निकलना चाहिए ? अब कोई पुलिस वाला ऐसी हिम्मत कर पायेगा ? कैसे हम उम्मीद रखे कि भविष्य में कोई पुलिस वाला मित्र के रुप नजर आयेगा ? क्या उन्हें प्रशिक्षण के दौरान ये नहीं सिखाया गया  कि एक अच्छा इंसान बनने की नुमाईश केमरे के समक्ष आने पर ही नहीं करे ? ऐसे अनेकों प्रश्न इस घटना ने समाज और सरकार के समक्ष खड़े कर दिये है ।

      फिर भी  भरोसा है दूसरे पुलिस वाले, इसको एक अच्छा इंसान बनने की दिशा में अंतिम कदम न समझेंगे । वो अपनी  कोशिशे जारी रखेंगे । केवल “किस” को ही इसका साधन न बनायेंगे ।  कसम खायेंगे कि किसी भी अपराध  होने से पहले ही वो एक्टिव हो जावेंगे, जब कोई थाने में एफ आई आर लिखवाने आये तो उसे दरिदंगी से देखने की बजाय उसको  भाई या बहन के रुप में सुनकर टरकाने की बजाए तुरंत दर्ज कर आगामी कार्यवाही पर जूट जायेंगे । किसी भी घटना की सूचना मिलने पर मीडिया के पहले स्थल पर पहुँच जायेंगे । देखिये,  ये कर के आप जरुर एक अच्छे वर्दीधारी इंसान बन जायेंगे । लोग आपका क्रूर रुप भूल कर एक मित्र के समान पसन्द करेंगे  । फिर आप को किसी “ किस ” विवाद में न पड़्ना पड़ेगा बल्कि लोग आपको  “किस” करेंगे ! ********************************devendra218767@gmail.com