Friday, 13 March 2015
Wednesday, 11 March 2015
Thursday, 5 March 2015
वेब दुनिया इन्दौर दि 05 मार्च 2015 व्यंग्य रचना : शहर का फागोत्सव भगोरिया
व्यंग्य
रचना : शहर का फागोत्सव भगोरिया
देवेन्द्रसिंह सिसोदिया
आदिवासी अंचल में 7 दिवसीय सांस्कृतिक लोकपर्व भगोरिया मनाया जा रहा
है। ये पर्व फाल्गुन माह में होली दहन के 7 दिन पूर्व से प्रारम्भ
होता है ये पर्व हमारे शहरों मे वर्ष में एक बार मनाने वाले वेलेंटाइन डे के
समान होता है। इस पर्व के दौरान आदिवासी लड़के-लड़कियां अपने प्रेम का इज़हार एक
दूसरे से करते हैं। जब प्रेम प्रस्ताव मंजूर होता है तो लड़का-लड़की वहां से
भाग जाते है और उनके गांव वाले शोर करते हुए चिल्लाते है भागरिया- भागरिया। बस ये
भागरिया ही “भगोरिया” में परिवर्तित हो गया। ये परम्परा वर्षों से चल
रही है। परम्परा गांव के बड़े-बुजुर्गों के समक्ष उनके हाजरी में आज भी जारी है।
आज
शहरों मे देखा जाए तो ऐसे प्रेम प्रस्तावों का दौर टीन एज़ के बच्चों से ही
प्रारम्भ हो चुका है। लड़के- लड़कियां दिन भर एक-दूसरे के बाहों में बाहें डाले बाईक
पर सवार होकर घूमते हुए पाए जा सकते हैं। पता नहीं ये पढ़ाई कब करते हैं।
वैसे
अभी-अभी पता चला है कि आजकल के बच्चे आंइस्टीन से भी अधिक इंटलिजेंट हो गए हैं।
घंटे भर पढ़ कर परीक्षा रुपी वैतरणी पार कर लेते हैं।
माता
पिता अपनी गाढ़ी मेहनत की कमाई को इनके उपर व्यय इस आशा में करते हैं कि ये अपना व
अपने माता-पिता का नाम रोशन करेंगे, हो सकता है इनमें से कोई आंइस्टीन निकल जाए। महान
वैज्ञानिक न्यूटन ने यह सिद्धांत प्रतिपादित किया था कि किसी भी वस्तु को ऊपर की
ओर उछालो तो पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के प्रभाव से वह तेजी से नीचे के ओर
आती है। इसी प्रकार आजकल के युवक-युवतियां भी इसी बात को सिद्ध करने की होड़ में है
कि जब भी इन्हें स्वतंत्र छोड़ दिया जाए तो कितनी तीव्र गति से इनका नैतिक एवं
चारित्रिक पतन होता है।
हमारे
देश के किसी मॉल में आप विजिट करेंगे तो आपको भगोरिये का पूरा आनन्द मिलेगा। यहां
पर पूरे साल प्रेमी-प्रेमिकाओं को विचरण करते आसानी से आप देख सकते हैं। आपको कभी
भगोरिया जाने का मौका लगा हो तो आपने देखा होगा कि वहां इन मेलों में मिठाई की
दुकाने, झूले-चकरी,
घोड़ा व ऊंट की सवारी करने को मिलती है। और इन सब से उब जाओ और एकांत
की आवश्यकता हो तो पर्दे वाले टूरिंग सिनेमाघर में फिल्में देखने का शौक भी पूरा किया
जा सकता है। इस प्रकार शहर में तो रोज भगोरिया का त्योहार मनाया जाता है।
कभी-कभी
इन भगोरियों में प्रेम के त्रिकोण की स्थिति भी बन जाती है। ऐसे में जो ताकतवर
होता है वो पूरी ताकत का इस्तमाल करते हुए प्रेयसी पर विजय पा लेता है। इस ताकत के
खेल में हिंसा भी अपना नंगा नाच नाचती है। जी हां इसी प्रकार शहर में भी कई बार
बहुकोणीय प्रेम-प्रसंग देखने में आते हैं। परिणाम वही कुछ राम नाम सत्य हो जाते है
और कुछ जेल को आबाद करते हैं।
वर्ष में एक बार
भगोरियों में लड़के-लड़की शराब का सेवन खुल कर करते हैं। शराब पीकर ये लोग मदमस्त
होकर ढोल और मांदल की थाप पर खूब नृत्य करते हैं। यही दृश्य, आपको अपने शहर के हर चौराहे,
हॉटल, मॉल एवं गलियों में आसानी से प्रतिदिन
देखे जा सकते हैं बस अंतर इतना कि यहां ढोल एवं मांदल के स्थान पर डीजे होता है।
तो भैया निराश न हो हमारी लोक संस्कृति हर शहर में आज भी जिंदा है हालांकि उसका
रूप बदल चुका है!
Friday, 27 February 2015
Tuesday, 24 February 2015
Monday, 23 February 2015
आयकर समाप्त कर कालाधन रोका जा सकता है
आयकर समाप्त कर
कालाधन रोका जा सकता है
देवेन्द्रसिंह सिसौदिया
भारत सरकार व्यक्तियों, हिंदू अविभाजित परिवारों (एचयूएफ),
कंपनियां, फर्मों, सहकारी समितियों और ट्रस्टों (जिन्हें व्यक्तियों और लोगों के समूह के रूप
में पहचान प्राप्त है) और किसी भी की अन्य कृत्रिम व्यक्ति के कर योग्य आय पर एक आयकर लगाता है। कर का भार प्रत्येक व्यक्ति पर अलग होता है। यह उदग्रहण भारतीय आय कर अधिनियम, 1961 द्वारा शासित
किया जाता है। भारतीय आयकर विभाग, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड(सीबीडीटी) द्वारा
संचालित है । प्रति वर्ष भारत सरकार के
वित्त मंत्रालय के द्वारा इस हेतु बज़ट में
प्रावधान करती है । आज लगभग चालीस वर्ष पश्चात हमारे देश के केवल 3 प्रतिशत
व्यक्ति आयकर के दायरे में आ पाए है । पिछले तीन वर्षों में हमारे देश में आयकरदाताओं की संख्या में कुछ बढ़ोतरी
हुई है, लेकिन अब भी यह संख्या केवल
तीन करोड़ 50 लाख ही है, जो कुल आबादी
का तीन प्रतिशत भी नहीं है । ऐसे में यह विचारणीय पहलू है कि हम केवल 3 प्रतिशत
लोगों को ही इस ब्रेकेट में ला पाए है । इन करदाताओं से जो राशि संग्रहित होती है
उसके संग्रहण और लेखा जोखा रखने के लिए करोड़ों रुपये की राशि व्यय की जाती है ।
दूसरी ओर कर से
बचने की जुगाड़ में कई अवैध धन्धे पनपते है और कालाधन संग्रह होता है । कालेधन की
वजह से ही भ्रष्टाचार, मह्ंगाई , हथियारों की तस्करी, शराब और ड्रग्स के अवैध
कारोबार और हवाला करोबार जैसे कई अनैतिक
कार्य को बढावा मिलता है । तो फिर क्या आयकर को समाप्त कर देना चाहिए ? दुनिया के
कई देश है जहाँ आयकर नहीं लगता है जैसे संयुक्त अरब अमीरात, कतर, बुनेई आदि । यदि
आयकर समाप्त कर दिया गया तो फिर देश का
राजस्व कहाँ से आयेगा ? सेवाकर के दायरे को बड़ाने के साथ उनकी वसूली और राशि को
देश के राजस्व में जमा होने को सुनिश्चित करने हेतु कड़े कदम उठाये जाए । गैर जरुरत
मंद लोगों को प्रदान की जा रही विभिन्न प्रकार की सब्सिडी को समाप्त किया जाए ।
बड़े कृषकों से कृषि उत्पाद पर मंडी स्तर पर कर लिया जाए ।
आयकर
समाप्त होने से जीडीपी बड़ेगा, रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, मह्ंगाई घटेगी
और मध्यम वर्ग के लोगों के पास अतिरिक्त
राशि रहेगी जो मनी फ्लो को बढायेगी । साथ ही देश का पैसा देश में ही रहेगा वो
कालेधन के रुप में जमा नहीं होगा । उम्मीद है सरकार सब्सिडी और कर प्रणाली में
आवश्यक सुधार करेगी ताकि कालेधन पर अंकूश लग सके ।
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