Friday, 17 October 2014

वेब दुनिया व्यंग्य चुनावी घोषणा पत्र दिनांक 17 अक्टूबर 2014

व्यंग्य रचना : चुनावी घोषणा पत्र

शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2014 (11:40 IST)
देवेन्द्रसिंह सिसौदिया   

लेखकों के लिए यह बेहद कठिन समय चल रहा है। आचार संहिता का पालन करना उनका परम धर्म और नैतिक कर्तव्य भी है। एक व्यंगकार, दो महीने तक व्यंग्य न लिखे तो उसका हाज़मा बिगड़ना तय है। इससे बचने कि लिए एक ही रास्ता था।  कुछ ऐसा लिखे जो आचार संहिता के दायरे में न आए। सो मैंने घोषणा-पत्र लिखने की ठान ली।

निर्णय लेना तो बड़ा आसान था किंतु अंजाम देना नहीं। तमाम सारे प्रश्न मेरे समक्ष थे। किस दल के लिए घोषणा-पत्र बनाया जाए, घोषणा-पत्र में क्या लिखा जाए, घोषणा पत्र की भाषा कौन सी और कैसी हो, घोषणा-पत्र की मार्केटिंग कैसे की जाए, घोषणा पत्र ऐसा दस्तावेज न बन जाए जिसे कोई बकवास कह कर कूड़े के डिब्बे में फेंक दे और अंत में- घोषणा-पत्र के लिए क्या पारिश्रमिक रखा जाए? ऐसे तमाम सारे प्रश्न थे जो मुझे झकझोर रहे थे। 
तभी मेरी बेटी आई बोली क्या परेशानी है? मैंने अपनी उलझनों को उसके समक्ष रखा। उसने कहा एक बार शुरुआत तो कीजिए सब ठीक हो जाएगा। मुझे अरस्तू का ये सुविचार याद आया कि 'अच्छी शुरुआत से आधा कार्य संपन्न हो जाता है। 
इस कार्य की शुरुआत करने के लिए हमने विभिन्न दलों के पिछले चुनावों के घोषणा-पत्रों को एकत्रित किया ताकि उनका अध्ययन किया जाए। अरे ये क्या, पिछले कई चुनावों के घोषणा-पत्रों में कोई अंतर ही नहीं है! अंतर आता भी कैसे, वर्षों से गरीबी, भ्रष्टाचार और महंगाई हमारी जनता को मुंह चिढ़ाती आ रही है वहीं राजनैतिक दल इनसे मुक्ति दिलाने के नाम पर चुनाव के बाद ठेंगा दिखा देते हैं। मैंने सोचा, नहीं इस बार कोई नए मुद्दे लाए जाए। बस निकल पड़ा देश भ्रमण के लिए। 
रेड कॉरपेट से रेड लाइट एरिया, रेलवे प्लेटफार्म और मलीन बस्तियां सभी दूर गया। इन बस्तियों के रहवासियों, आम ग्रहणियों, गरीब किसानों, रेहड़ी वालों से मिला किंतु सभी वर्गों का एक ही दर्द था गरीबी, भ्रष्टाचार और मंहगाई। 
देश भ्रमण के पश्चात मैंने घोषणा पत्र लिखने की शुरुआत की। सर्वप्रथम मैंने देश की जनता की आवश्यकता के मुताबिक मुद्दों को एक स्थान पर लिखना प्रारंभ किया। भ्रष्टाचार, गरीबी, मह्ंगाई, नारी उत्पीड़न (नारी सशक्तिकरण), आरक्षण, राजनीति से अपराध (दागी नेताओं को) को दूर रखने,  देश की शिक्षा नीति, कृषि नीति, आर्थिक नीति, विदेशी व्यापार नीति, रक्षा नीति, विदेश नीति, आयात-निर्यात नीति, युवा नीति, राष्ट्रीय रोजगार नीति, स्वास्थ्य नीति और प्रदूषण को प्रमुख स्थान मिला। हर मुद्दे को स्पष्ट करते हुए मैंने उससे निपटने और लागू करने के लिए समयावधि और कार्य योजना भी तय की। एक घोषणा-पत्र का कच्चा मसौदा लगभग तैयार था। घोषणा पत्र उस राजनैतिक दल के सिद्धांत, नीति और नियत को प्रकट करने वाला एक महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है फिर चाहे वह एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ बन जाए।

मसौदा लेकर मैं तैयार था कोई दल आए और मुझे घोषणा-पत्र बनाने के लिए आदेशित करे। एक दिन मुझसे एक राष्ट्रीय दल के नेता ने सम्पर्क किया और अपनी इच्छा व्यक्त की। मैंने भी अपनी उत्कंठा को शांत करने के उद्देश्य से ढेर सारे प्रश्न कर डाले। नेताजी बोले 'अरे, खामखा इतने प्रश्न किये जा रहे हो। हमने कौनसा तुम्हें रामायण या महाभारत लिखने के लिए कह दिया है जिनका अनुसरण लोग करेंगे। आप तो इतने गंभीर हो गए हमें कौन से इन वादों को पूरा करना है? मैंने पूछा 'नेताजी इन वादों के साथ कोई समयावधि और कार्ययोजना का भी समावेश करे'। 
नेताजी बोले 'अरे, भाई इतनी मेहनत किए हो और आपकी तीव्र इच्छा है तो कर दीजिए'। 
अब बात आई पारिश्रमिक की, तो बोले 'भाई, चुनाव जीत गए तो बना देंगे किसी साहित्य संस्था या अकेदमी का अध्यक्ष । 
हम लग गए घोषणा-पत्र को तैयार करने में। इसी बीच एक ओर दल से फोन आ गया। 'भाई, हमने सुना है आप किसी दल का घोषणा पत्र बना रहे हैं?  
“हाँ, जी ठीक सुना आपने” । 
“अरे, तो भाई कुछ मुद्दों को अल्टर कर हमारा भी तैयार कर दो” । 
फिर भी नेताजी आपके द्ल के कुछ सिद्धांत और नीतियां अलग होंगी। कृपा करके मुझे बता दे ताकि उसके अनुसार घोषणा पत्र बनाया जा सके।
“अरे, छोड़ो जी सिद्धांत-विद्धांत हमें तो मतदाता को मोहित करने वाला लोकलुभावन अच्छे दिन के ख्वाब दिखाने वाला  घोषणा पत्र चाहिए सो आप बना दीजिए” । पारिश्रमिक की कतई चिंता मत कीजिए, हम आपको मंत्री पद से नवाज़ देंगे। 
हमें भी लाल बत्ती दिखने लगी सो दस-बीस लोक-लुभावन घोषणा-पत्र के सेट तैयार कर लिए हैं। हमारी  दुकान इन रेडीमेड घोषणा-पत्रों से सु-सज्जित है। बोलो भऊ, आपको कौनसा चाहिए?



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Sunday, 12 October 2014

कैलाश और मलाला की दोहरी भूमिका का वक्त दिनांक 21/12/2014

कैलाश और मलाला की दोहरी भूमिका का वक्त
देवेन्द्रसिंह सिसौदिया
      नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी भारत से और मलाला यूसुफजयी पाकिस्तान से है । दोनों देशों की राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक स्थिति एकदम विपरित  है । एक ओर जहाँ भारत के सत्यार्थी है जिन्हें दूसरे ही दिन प्राधनमंत्री मोदी ने मुलाकात कर बधाई देते  वहीं दूसरी ओर मलाला है जो अपने ही देश में महफ़ूज  नहीं है । पाकिस्तानी समाचार पत्र डान के अनुसार प्रतिबन्धित आतंकवादी संगठन तहरीके तालिबान के प्रवक्ता शहाउल्ला शाहिद ने कहा कि उन्हें पता है कि 17  वर्षीय मलाला को इस्लाम के दुश्मन पुरस्कृत करेंगे । उसने कहा कि मलाला ने धर्मनिरपेक्षता के लिए इस्लाम छोड़ दिया जिसके लिए उसे पुरस्कार दिया जा रहा है ।
      नोबेल शांति से पुरस्कृत इन दोनों पड़ोसी देशों के मध्य रिश्तों में शुरु से खटास है । पाकिस्तान लगातार युद्ध विराम का उल्ल्ंघन करता रहा है और घूसपैठियों को भारत में प्रवेश दिलाता रहा है । आतंकवादी स्ंगठनों के दबाव में  अंतर्रराष्ट्रीय स्तर पर काश्मीरी राग अलापना उसकी आदत सी हो गई है ।

      पाकिस्त्तान सरकार की स्थिति गले की हड्डी के समान हो गई है । अंतर्रराष्ट्रीय स्तर से पड़्ते दबाव में आकर यदि आतंकवादियों पर कठोर कार्यवाही करे तो उनकी आँख की कीरकीरी बन जाता है । हाँलाकि वो देखावे के लिए जरुर छोटी-मोटी कार्यवाही करता है किंतु यह पर्याप्त नहीं है । दूसरी ओर एक छोटी सी कार्यवाही का नतीजा ये होता है कि पेशावर में मासूम बच्चों की बडी क्रुरता से जान ले ली गई ।

      पेशावर की दर्दनाक घटना के पश्चात पाकिस्तान सरकार वर्षों से रुकी फांसी की सजा को बहाल कर दिया । परिणाम स्वरुप कुछ ऐसे कैदियों को फांसी दी गईं जिन पर वहाँ के नेताओं को जान से मारने की साजिश और कोशिश की थी । दूसरी ओर मुम्बई हादसों के आरोपी खूले आम घूम रहे है और भारत विरोधी गतिविधियों को संचालित कर रहे है उन्हें सबूतों के अभाव में जमानत दी जा रही है । पाकिस्तान की य दोमूही नीतियों को पूरी दुनिया गौर से देख रही है । ये सोच कि इनका आका अमेरिका इसको हमेशा साथ देता रहेगा ये भूल जाए और अपने पड़ोसियों से अच्छे तालूकात स्थापित करना चाहिए । ये वो ही अमेरिका है जिसने ओसामा बिन लादेन को इन्हीं की जमी पर निस्तनाबूत कर दिया ।  पेशावर की घटना के पश्चात ये सम्भावना की जाती है कि जो आस्तिन के साँप इन्होंने पाल रखे है उन्हें बाह्रर निकाल कर उन्हें उनकी मुनासिफ जगह पर पहुँचा देंगे ।  इसी में इनकी समझदारी होगी ।
     
 भारत के सत्यार्थी ने बाल मजदूरी के खिलाफ एक लम्बी लड़ाई  छेड़ रखी है वहीं मलाला मुस्लीम महिलाओं की आजादी के खिलाफ जेहाद का आगाज़ किया है । दोनों के उद्देश्य लगभग एक से है । सम्भव है इन दोनों देशों के निवासियों को एक साथ पुरस्कृत करने का उद्देश्य दोनों देशों के दरमियाँ जो रिश्ते बिगड़े है उसे सुलझाने का हो । ऐसे में इन दोनों की दोहरी भूमिका निभाने की बारी है कि वो अपने अपने देशों की ओर से शांति कायम करने का काम करे । आशा है मलाला पाकिस्तान सरकार को आंतरिक शांति कायम करने के साथ ही पड़ोसियों से मधुर सम्बन्ध स्थापित करने कि लिए बाध्य करेगी । पाकिस्तान सरकार की भी नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वो आतंकी संगठनों के चुंगल से बाहर आकर क्षेत्र मे अमन शांति का वातावरण निर्मित  कर मलाला को दिये शांति के नोबेल पुरस्कार की लाज रखे ।
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Saturday, 11 October 2014

हिन्दी पखवाड़ा के पुरस्कार दिनांक 11 अक्टू 2014

हिन्दी पखवाड़े के दौरान सम्पन्न  प्रतियोगिताओं की विभिन्न श्रेणियों में सर्वाधिक पुरस्कार प्राप्त होने का गौरव मुझे  प्राप्त हुआ । अखिल भारतीय निबन्ध प्रतियोगिता हेतु मेरे निबन्ध को प्रविष्टि मिली । सुप्रसिद्ध साहित्यकार प्रो. सरोजकारजी, डॉ सन्ध्या भराड़े (मराठी साहि)  एवं उत्कल बैनर्जी ( बंगाली साहि.) के कर कमलों द्वारा मुझे ये सम्मान प्राप्त होने का सुअवसर मिला ।